कहाँ तक ये तकलीफ़-ए-मा ला-युताक़ — मीर तक़ी मीर

कहाँ तक ये तकलीफ़-ए-मा ला-युताक़ हुईं मुद्दतों नाज़-बर्दारियाँ

“How far can this pain of separation endure? For ages, the pride has become unbearable.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

कहाँ तक यह बिछोह का दर्द सहन कर पाएगा? सदियों से यह नखरा असहनीय हो गया है।

विस्तार

यह शेर, मिर्ज़ा तक़ी मीर साहब का है, जो दिल के ज़ख्मों का बोझ उठाना सिखाता है। शायर यहाँ पूछते हैं कि दिल का ये दर्द... ये तक़लीफ़-ए-मा... कब तक सह पाएगा? और ये नज़ाकतें, ये नज़ा-बर्दारियाँ... ये कब तक अपना रंग दिखाएंगी? यह एक गहरे दर्द और थकान की बात है! जब इंसान का सब्र जवाब दे जाता है, तब वह इस तरह सवाल करता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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