तब-ए-ग़म तो गई तबीब वले
फिर न आया कभू मिज़ाज-ए-बहाल
“The ailment of sorrow, the physician cured, but never did the disposition of wellness return.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
तबा-ए-ग़म तो गई तबीब वले, पर फिर कभी मिज़ाज-ए-बहाल नहीं आया।
विस्तार
यह शेर भावनात्मक टूटन और अधूरेपन की बात करता है। शायर कहते हैं कि ग़म का तो इलाज हो गया, पर किसी ने मिज़ाज-ए-बहाल (सही स्वभाव) को वापस नहीं किया। इसका मतलब है कि कुछ दर्द इतने गहरे होते हैं कि उन्हें सिर्फ़ दवा से ठीक नहीं किया जा सकता। कुछ नुक़सान ऐसे होते हैं जो वापस नहीं आते, भले ही इलाज हो जाए।
Comments
Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.
No comments yet.
