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फिर न आए जो हुए ख़ाक में जा आसूदा
ग़ालिबन ज़ेर-ए-ज़मीं 'मीर' है आराम बहुत

If I don't return to the dust, O Meer, let my tears be purified, Perhaps beneath the earth, there is much rest.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

यदि मैं धूल में न मिलूँ, तो ओ मीर, मेरे आँसू शुद्ध हो जाएँ। शायद ज़मीन के नीचे बहुत आराम है।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर का एक गहरा तफ़क्कुर है, जो मौत और जुदाई के दर्द पर आधारित है। शायर कहते हैं कि अगर ज़िंदा लोग अपने महबूब को वापस नहीं पा सकते, तो शायद उन्हें मौत में ही सुकून मिल जाए। वह सोचते हैं कि ज़मीन के नीचे जो आराम है, वो ज़िन्दगी के गम से कहीं ज़्यादा बेहतर है। यह एक बहुत ही फ़लसफ़ियाना नज़रिया है, जो क़ुबूलियत और आख़िरी राहत की बात करता है।

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