ग़ज़ल
जी में है याद रुख़-ओ-ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम बहुत
जी में है याद रुख़-ओ-ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम बहुत
यह ग़ज़ल एक प्रियजन की याद और उसके नज़ारों की याद में डूबी हुई है। शायर बताता है कि उसकी याद में रोना आता है और वह बेचैनी तथा भावनाओं के तूफानों में फँसा हुआ है। यह प्रेम की गहन भावनाओं और तड़प का वर्णन करती है।
गीत सुनें
1
जी में है याद रुख़-ओ-ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम बहुत
रोना आता है मुझे हर सहर-ओ-शाम बहुत
मेरे दिल में आपकी काली ज़ुल्फ़ और चेहरा बहुत याद आता है, इसलिए मुझे सुबह और शाम दोनों समय रोना आता है।
2
दस्त-ए-सय्याद तलक भी न मैं पहुँचा जीता
बे-क़रारी ने लिया मुझ को तह-ए-दाम बहुत
मैं ज़िंदा होकर शायर सैयाद के स्पर्श तक भी नहीं पहुँच पाया; / मेरी बेचैनी ने मुझे बहुत गहरे गर्त में खींच लिया है।
3
एक दो चश्मक इधर गर्दिश-ए-साग़र कि मुदाम
सर चढ़ी रहती है ये गर्दिश-ए-अय्याम बहुत
एक दो नज़रों में, यह सागर की हलचल है, और दिनों का यह चक्कर बहुत सिर पर चढ़ा रहता है।
4
दिल-ख़राशी-ओ-जिगर-चाकी-ओ-ख़ूँ-अफ़्शानी
हूँ तो नाकाम पे रहते हैं मुझे काम बहुत
मेरा दिल, मेरा जिगर, मेरी भावनाएं और मेरा खून—इतनी शक्ति से भर गया हूँ कि मेरे पास बहुत सारे काम बचे हुए हैं।
5
रह गया देख के तुझ चश्म पे ये सतर-ए-मिज़ा
साक़िया यूँ तो पढ़े थे मैं ख़त-ए-जाम बहुत
तुम्हारे चश्मे पर यह नज़ाकत देखकर मैं मोहित हो गया; साक़िया, मैंने तो जाम के कई किस्से सुने थे।
6
फिर न आए जो हुए ख़ाक में जा आसूदा
ग़ालिबन ज़ेर-ए-ज़मीं 'मीर' है आराम बहुत
यदि मैं धूल में न मिलूँ, तो ओ मीर, मेरे आँसू शुद्ध हो जाएँ। शायद ज़मीन के नीचे बहुत आराम है।
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