भड़के है आतिश-ए-ग़म मंज़ूर है जो तुझ को — मीर तक़ी मीर

भड़के है आतिश-ए-ग़म मंज़ूर है जो तुझ को जलने का आशिक़ों के आ देख अब तमाशा

“The flame of sorrow is kindled, and it is pleasing to you, To watch the spectacle of lovers burning, oh, see now.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

भड़के है आतिश-ए-ग़म, मंज़ूर है जो तुझ को, जलने का आशिक़ों के आ देख अब तमाशा। (अर्थात, गम की आग भड़क उठी है, और यह तुम्हें अच्छा लगता है, कि तुम आशुकों को जलते हुए देखना एक तमाशे की तरह देखती हो।)

विस्तार

यह शेर इश्क़ की उस कड़वी सच्चाई को बयां करता है जब दर्द भी एक तमाशे जैसा लगने लगे। शायर कहते हैं कि गम की आग भड़क उठी है, और ये मंज़ूर है आपको। यानी, हमारा दर्द... आपको तमाशे की तरह, देखने में मज़ा आता है। यह उस पीड़ा को दर्शाता है जब महबूब को आपके टूटने का नशा होने लगता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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