अपने शहीद-ए-नाज़ से बस हाथ उठा कि फिर — मीर तक़ी मीर

अपने शहीद-ए-नाज़ से बस हाथ उठा कि फिर दीवान-ए-हश्र में उसे लाया न जाएगा

“Just raising a hand from my beloved, the martyr of grace, he said, That he would not be brought into the court of reckoning.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

अपने शहीद-ए-नाज़ से बस हाथ उठा कि फिर दीवान-ए-हश्र में उसे लाया न जाएगा। (अर्थात, उसने अपने प्यारे, जो नज़ाकत के शहीद हैं, से सिर्फ हाथ उठाकर कहा कि उसे हिसाब के दरबार में नहीं लाया जाएगा।)

विस्तार

यह शेर महबूब के इश्क़ को एक अलौकिक दर्जा देता है। शायर कहते हैं कि अगर मैं बस अपने 'शहीद-ए-नाज़' को हाथ उठा दूँ, तो मेरा बचाव हो जाएगा! दीवान-ए-हश्र, यानी क़यामत का दिन, जहाँ हर कोई हिसाब देगा। यहाँ शायर प्रेम की ताकत को इतना बढ़ा देते हैं कि महबूब का ज़िक्र ही इंसान को तौबा और जन्नत का एहसास करा देता है। यह सिर्फ इश्क़ नहीं, यह एक तरह की इबादत है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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