देखियो पंजा-ए-मिज़्गाँ की टक आतिश-दस्ती — मीर तक़ी मीर

देखियो पंजा-ए-मिज़्गाँ की टक आतिश-दस्ती हर सहर ख़ाक में मिलते हैं दर-ए-तर कितने

“I saw the blazing craft of the mizzgaan's paw; / Every dawn, how many doors of longing are found in the dust.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

देखना, मिज़्गाँ के पंजे की टक आतिश-दस्ती जैसा है; / हर सुबह, धूल में कितने दर-ए-तर मिलते हैं।

विस्तार

ये शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर की गहरा सोच है। इसमें ज़िंदगी के सफर और उम्मीदों के बारे में बात की गई है। पहले मिसरे में 'मिज़्गाँ' का ज़िक्र है, जो किसी बहुत ही तीव्र और जोशीले एहसास का प्रतीक है। शायर कह रहे हैं कि बस उस जोशीले एहसास को देखकर ही दिल में आग लग जाती है। और दूसरा मिसरा बताता है कि हर सुबह, इस धूल भरे जीवन में, हमें चाँद के कितने दरवाज़े मिलते हैं—यानी उम्मीदों के कितने मौके मिलते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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