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तुझ बिन शकेब कब तक बे-फ़ाएदा हूँ नालाँ
मुझ नाला कश के तो ऐ फ़रियाद-रस किधर है

How long will I be useless without you, O Nalaan? / And where is the cry of sorrow, O source of lamentation?

मीर तक़ी मीर
अर्थ

तेरे बिना शकेब कब तक बे-फ़ायदा हूँ नालाँ। मेरा नाला कहाँ कश के, ऐ फ़रियाद-रस, किधर है।

विस्तार

यह शेर आशिक़ की उस बेचैनी को बयान करता है जब उसे लगता है कि उसका वजूद, उसका होना, महबूब के बिना बेमानी है। वह पूछते हैं कि मेरा दर्द इतना गहरा है कि सिर्फ़ आँसुओं में सिमट जाए? शायर कहते हैं कि अगर मेरी फ़रियाद सिर्फ़ आँसुओं का बहाव है, तो मेरी सच्ची चीख़, मेरा सच्चा ग़म, कहाँ है! यह एक ज़ोरदार सवाल है, जो दिल की गहराई से निकल रहा है।

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