ले ही जाती है ज़र-ए-गुल को उड़ा — मीर तक़ी मीर
ले ही जाती है ज़र-ए-गुल को उड़ा
सुब्ह की भी बाव-बादी चोर है
“It carries away the dust of roses in the breeze, The thief of dawn is the wastefulness of the morning.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
यह (हवा) गुलाब की धूल को उड़ा ले जाती है, और सुबह की बर्बादी (व्यर्थता) सुबह का चोर है।
विस्तार
Mir Taqi Mir साहब यहाँ पल-पल की नश्वरता को बयान कर रहे हैं। शायर कहते हैं कि सुबह की बेफ़िक्री या बेवजह की बातें भी... फूलों का कोमल सार चुरा ले जाती हैं! यह शेर एक गहरे एहसास को छूता है कि ज़िंदगी में कोई भी खूबसूरती, चाहे वो सुबह की हो या फूलों की, हमेशा के लिए नहीं रहती। यह एक मीठी सी तन्हाई का इक़रार है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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