किसे क़ैद-ए-क़फ़स में याद गुल की
पड़े हैं अब तो जीने ही के लाले
“To whom, in the cage of confinement, the memory of Gul's bloom is now a mere sustenance for life.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
कसे क़ैद-ए-क़फ़स में याद गुल की पड़े हैं अब तो जीने ही के लाले।
विस्तार
यह शेर जीवन की कड़वी सच्चाई को बयान करता है। शायर कहते हैं कि जब इंसान किसी मुश्किल या तंगी में फँस जाता है, तो नज़रों में महफ़िल की रौनक, महबूब की यादें... सब फीकी पड़ जाती हैं। बस, पेट भरने का और ज़िंदा रहने का ख्याल दिमाग पर हावी हो जाता है। यह शायरी है, जो एहसास और हकीकत के बीच का फासला बताती है।
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