नहीं उठता दिल-ए-महज़ूँ का मातम — मीर तक़ी मीर
“The heart of the sorrowful does not mourn/grieve, Only God can save us from this calamity.”
अर्थ
महज़ूँ दिल का मातम नहीं उठता, केवल ख़ुदा ही इस मुसीबत से निकाल सकता है।
विस्तार
यह शेर उस गहरे ग़म को बयां करता है, जब दर्द इतना बढ़ जाता है कि इंसान को खुद का ग़म भी नहीं आता। शायर कहते हैं कि दिल-ए-महज़ूँ (टूटे हुए दिल) का मातम तक नहीं उठता। इसका मतलब है कि आप इतने टूटे हुए हैं कि रोना भी आपकी ताक़त से बाहर है। यह शेर हमें याद दिलाता है कि जब हम अपनी पूरी ताक़त खो देते हैं, तब हमें किसी इंसान पर नहीं, बल्कि ख़ुदा पर भरोसा करना चाहिए।
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