दिल-ए-ख़स्ता-लोहू जो हो गया तो भला हुआ कि कहाँ तलक — मीर तक़ी मीर

दिल-ए-ख़स्ता-लोहू जो हो गया तो भला हुआ कि कहाँ तलक कभू सोज़-ए-सीना से दाग़ था कभू दर्द-ओ-ग़म से फ़िगार था

“If the heart, which was worn out, turned to blood, then it was good, that wherever it was, It was once stained by the burning of the chest, and once afflicted by pain and sorrow.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

शायर कहता है कि जो दिल बहुत खराब हो गया और खून बन गया, तो अच्छा हुआ कि कहीं भी यह रहा है। कभी छाती की जलन से दाग लगा था, और कभी दर्द और ग़म से फ़िगार (चेहरा) पर निशान था।

विस्तार

मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि दिल का ख़स्ता-लोहू (थका हुआ) हो जाना भी अच्छा है। उनका इशारा है कि जब दर्द इतना गहरा हो जाता है कि दिल खुद ही टूट जाए, तो यह एक सुकून है। क्योंकि पहले, ये सारे दर्द... सीने पर दाग़ बनकर दिखते थे, और चेहरे पर ग़म बनकर छा जाते थे। अब ये सब अंदर समा गया है!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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