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ख़ाली शगुफ़्तगी से जराहत नहीं कोई हर ज़ख़्म याँ है जैसे कली हो बक्स रही

From the emptiness of the chest, there is no wound, Every wound is like a bud that is blooming.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

खाली शगुफ़्तगी से जराहत नहीं कोई, हर ज़ख़्म याँ है जैसे कली हो बक्स रही। इसका शाब्दिक अर्थ है कि खालीपन या शगुफ़्तगी के कारण कोई घाव नहीं है, और हर घाव एक कली की तरह खिल रहा है।

विस्तार

यह शेर दर्द और खूबसूरती के रिश्ते को समझाता है। शायर कहते हैं कि खालीपन या शगुफ़्तगी से कोई ज़राहत नहीं होती। इसके बजाय, शायर का कहना है कि हर ज़ख़्म... हर दर्द... एक कली की तरह है जो खिल रही है। यानी, चोट लगना कोई अंत नहीं है, बल्कि वो एक नई शुरुआत है, एक खिलता हुआ एहसास है।

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