“Who else could be, when dawn was accepted as true, It was not our prayer to be ashamed of your grace.”
जब सुबह सच मानी गई, तो और कौन हो सकता है। यह हमारी दुआ नहीं थी कि आप अपनी कृपा पर शर्मिंदा हों।
ये शेर सिर्फ एक मोहब्बत का इकरार नहीं है, ये एक टूटे हुए अहसास का बयान है। शायर कह रहे हैं कि जब सच्चाई (सहर) ने दस्तक दी, तब तक वह दिल किसी और के नाम हो चुका था। और सबसे गहरा दर्द यह है कि उन्हें इस बात का कोई गम नहीं था कि महबूब को इस इश्क़ के असर पर शर्मिंदगी महसूस हो... बस यह अहसास ही काफी है कि वह कभी हमारी दुआ का हिस्सा नहीं था।
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