क्या जली जाती है ख़ूबी ही में अपनी ऐ शम्अ' — मीर तक़ी मीर

क्या जली जाती है ख़ूबी ही में अपनी ऐ शम्अ' कह पतंगे के भी कुछ शाम-ओ-सहर करने की

“Does one even burn with their own excellence, O candle? Let the moth also have some evenings and mornings to spend.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

क्या अपनी ख़ूबी में ही जलना पड़ता है ऐ शम्अ' कह पतंगे के भी कुछ शाम-ओ-सहर करने की।

विस्तार

यह शेर एक बहुत गहरे फ़लसफ़े को बयान करता है। शायर कहते हैं कि ये शमा अपनी ख़ुशी, अपनी अच्छाई जला रही है। पर जब पतंगा इसे देखता है, तो वो पूछता है—क्या बस इतना ही? उसे भी तो थोड़ा सा वक़्त चाहिए.... रात का और दिन का.... ये शेर हमें सिखाता है कि हर क़ुर्बानी के बाद, हमें भी अपनी ज़िंदगी की थोड़ी इज़्ज़त और वक़्त की माँग करनी चाहिए।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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