न ठहरी टुक इक जान बर-लब रसीदा — मीर तक़ी मीर

न ठहरी टुक इक जान बर-लब रसीदा हमें मुद्दआ' गुफ़्तुगू थी कसू की

“The soul, which did not settle, was like a drop of nectar on the lips; we were greatly in need of conversation, oh beloved.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

न ठहरी टुक इक जान बर-लब रसीदा, जिसका अर्थ है कि वह आत्मा जो स्थिर नहीं हो सकी, वह होठों पर अमृत की बूँद के समान थी; और हमें प्रिय के साथ बातचीत की बहुत आवश्यकता थी।

विस्तार

इस शेर में एक आशिक़ ने अपनी तन्हाई और चाहत को बयां किया है। शायर कहते हैं कि महबूब का जो पल भर का नज़ारा था, वह तो सह लिया जा सकता था.... लेकिन जो चीज़ उन्हें सबसे ज़्यादा चाहिए थी, वह थी बातचीत का सिलसिला! यह एहसास दिलाता है कि महज़ देखना काफी नहीं होता, बल्कि वो लगातार जुड़ाव, वो बातें ही इंसान को ज़िंदा रखती हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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