सिर्फ़ लिल्लाह ख़म के ख़म करते
न क्या चर्ख़ ने कलाल हमें
“Neither did the mere whisper of Lillah, nor the whirling of the artistic sword, diminish us.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
केवल अल्लाह के लिए ख़म के ख़म करना, न ही चर्ख़ ने कलाल हमें।
विस्तार
यह शेर एक बहुत गहरे फ़लसफ़े को छूता है। शायर सवाल कर रहे हैं कि दुनिया में जो भी नुक़सान होता है, उसे अल्लाह की मर्ज़ी मान लिया जाता है। लेकिन, अगर सब कुछ इत्तेफ़ाक़ और मर्ज़ी से होता है, तो यह बता दीजिए कि ज़िंदगी का ये चर्ख़ (समय का पहिया) हमारी जो निखार, हमारी जो खूबसूरती.... वो कहाँ ले गया? यह एक बहुत उदास तफ़कर है।
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