हूँ ज़र्द ग़म-ए-ताज़ा-निहालान-ए-चमन से — मीर तक़ी मीर

हूँ ज़र्द ग़म-ए-ताज़ा-निहालान-ए-चमन से उस बाग़-ए-ख़िज़ाँ-दीदा में मैं बर्ग-ए-ख़िज़ाँ हूँ

“I am a leaf of autumn in that garden of autumn, from the yellow sorrow of the fresh meadow.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

मैं ताज़े उपवन के पीले दुःख से, उस पतझड़ देखने वाले बाग़ में एक पतझड़ का पत्ता हूँ।

विस्तार

यह शेर ज़िंदगी के उस कड़वे सच को बयां करता है, जहाँ खूबसूरती के बीच भी उदासी का साया होता है। शायर खुद को 'ज़र्द ग़म' यानी पीला गम बताते हैं। जैसे एक बाग़ में ताज़गी और हरियाली होती है, पर उस ताज़गी में भी, वो ख़ुद को ख़िज़ाँ का पत्ता मानते हैं। यह एहसास है कि ज़िंदगी में हर चमक के बाद, एक ठहराव, एक उदासी ज़रूर आती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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