तकलीफ़ न कर आह मुझे जुम्बिश-ए-लब की — मीर तक़ी मीर

तकलीफ़ न कर आह मुझे जुम्बिश-ए-लब की मैं सद सुख़न-आग़ुश्ता-ब-ख़ूँ ज़ेर-ए-ज़बाँ हूँ

“Do not torment me with the mere movement of the lips; I am a treasure of sweet words, hidden beneath my tongue.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

तकलीफ़ न कर आह मुझे जुम्बिश-ए-लब की, मैं सद सुख़न-आग़ुश्ता-ब-ख़ूँ ज़ेर-ए-ज़बाँ हूँ। इसका शाब्दिक अर्थ है कि आप मुझे केवल होंठों की हरकत से कष्ट न दें, क्योंकि मैं अपनी ज़बान के नीचे मधुर शब्दों का एक खजाना हूँ।

विस्तार

यह शेर अनकहे एहसासों के बोझ को बयां करता है। मिर् तक़ी मीर अपने महबूब से कह रहे हैं कि मेरे होंठों की हलचल से या मेरे खामोश रहने से परेशान न हों। शायर बताते हैं कि मेरी ज़ुबान के नीचे... कितनी कहानियाँ दफ़न हैं! ये सिर्फ़ बातें नहीं हैं, ये सदियों का दर्द है, जो ख़ून सा गहरा है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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