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'मीर' आवारा-ए-आलम जो सुना है तू ने
ख़ाक-आलूदा वो ऐ बाद-ए-सबा मैं ही हूँ

Oh, the wanderer of the world, that you have heard my tale, I am that dusty breeze, in the morning's soft gale.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

शायर (मीर) कह रहे हैं कि जो आपने संसार के आवारापन की बात सुनी है, वह धूल से सना हुआ मैं खुद, सुबह की कोमल हवा में हूँ।

विस्तार

यह शेर जीवन की नश्वरता और पहचान की उलझन को दिखाता है। मीर तक़ी मीर कह रहे हैं कि जो 'आवाड़े-ए-आलम' (संसार का भटकने वाला) तुमने सुना है, वह धूल-मिट्टी वाला जो है, वह असल में मैं खुद हूँ—वह सुबह की हवा! शायर कहते हैं कि हमारी पहचान किसी एक जगह से नहीं होती, बल्कि बदलाव और बहाव में होती है। यह अपने 'बिना ठिकाने' होने का स्वीकार है।

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