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कासा-ए-सर को लिए माँगता दीदार फिरे
'मीर' वो जान से बेज़ार गदा मैं ही हूँ

For the sight of my beloved, my heart yearns and wanders, 'Mir', I am the servant, weary of this life's strife.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

सिर के कासा के लिए वह दीदार माँगता फिरे, 'मीर', वो जान से बेज़ार गदा मैं ही हूँ।

विस्तार

यह शेर बेताब इश्क़ और आत्म-समर्पण की कहानी कहता है। शायर कहते हैं, 'सिर्फ अपने सिर के लिए, मैं दीदार माँगता हूँ।' और फिर कहते हैं... 'ए गदा, मैं तो खुद जान से बेज़ार हूँ।' इसका मतलब है कि महबूब का एक नज़ारा पाना, जीवन जीने की इच्छा से भी ज़्यादा ज़रूरी है। यह इश्क़ की उस हद को बयां करता है, जहाँ जान भी कुर्बान करने को तैयार हो जाती है!

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