ग़ैर की तेग़-ए-ज़बाँ से तिरी मज्लिस में तो हम — मीर तक़ी मीर
ग़ैर की तेग़-ए-ज़बाँ से तिरी मज्लिस में तो हम
आ के रोज़ एक नया ज़ख़्म उठा जाते हैं
“From the stranger's sword of tongue, in your gathering, we / Arrive daily and receive a new wound.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
पराए की ज़ुबान की तलवार से, तुम्हारी महफ़िल में तो हम आके रोज़ एक नया ज़ख़्म उठा जाते हैं।
विस्तार
यह शेर उस दर्द को बयान करता है जो सिर्फ़ प्यार में पड़ जाने से होता है। शायर कहते हैं कि हमें महबूब की महफ़िल में, ग़ैर की ज़बान की तलवार से चोट लगती है। यह एक कड़वा सच है... कि कभी-कभी आपके अपने होने का एहसास भी इतना दर्दनाक होता है, कि हर रोज़ एक नया ज़ख्म सहना पड़ता है। यह इश्क़ की सबसे बड़ी उलझन है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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