“You will forget the covenant of Farhad and Qais, if we reach the streams of broken hearts.”
जाओगे भूल 'अह्द को फ़रहाद-ओ-क़ैस के, यदि पहुँचीं हम शिकस्ता-दिलों की भी बारियाँ। (अर्थात, यदि हम टूटे हुए दिलों के पास पहुँचेगी, तो तुम फ़राहाद और क़ैस के वादे को भी भूल जाओगे।)
यह शेर भावनात्मक ज़िम्मेदारियों के भारीपन को दिखाता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि अगर उन्हें कभी टूटे हुए दिलों का ग़म दिखेगा, तो वह अपने वादे भूल जाएंगे... यहाँ तक कि फ़रा़हद और क़ैसर जैसे बड़े आशिकों से किए गए वादे भी! यह बताता है कि इंसान का दुख कभी-कभी बड़े से बड़े वादों से ज़्यादा भारी हो जाता है।
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