आ शैख़ गफ़तगू-ए-परेशाँ पे तो न जा — मीर तक़ी मीर
आ शैख़ गफ़तगू-ए-परेशाँ पे तो न जा
मस्ती में अब तो क़िबला-ए-हाजात हो गई
“Do not go after the conversation of the restless Sheikh, For in intoxication, the direction of desire has been found.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
ऐ शैख़, परेशाँ बातचीत पर तो न जा, मस्ती में अब तो ज़रूरत का ठिकाना मिल गया।
विस्तार
यह शेर बहुत गहरा है, जो बताता है कि हमारी ज़रूरतें और हमारा ध्यान कैसे बदल जाता है। शायर कह रहे हैं कि बेवजह की बातों या बातों के जाल में मत फँसना। जब आप किसी मस्ती या गहरे जज़्बे में होते हैं, तो आपकी असली चाहत और आपका क़िबला कहीं और हो जाता है। यह दिल की सच्चाई को बयां करता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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