ज़ख़्म बिन ग़म बिन और ग़ुस्सा बिन — मीर तक़ी मीर

ज़ख़्म बिन ग़म बिन और ग़ुस्सा बिन अपना खाना हराम होता है

“Without wounds, without sorrow, and without anger, One's own food becomes forbidden.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

ज़ख़्म, ग़म और ग़ुस्सा तीनों के बिना, अपना भोजन भी हराम हो जाता है।

विस्तार

यह शेर हमें एक गहरे नैतिक सवाल की तरफ ले जाता है। शायर कहते हैं कि ज़ख्म, ग़म या गुस्सा, ये सब दर्द तो हैं.... लेकिन इन सब से कहीं ज़्यादा बड़ा और भारी गुनाह है अपना 'खाना हराम' होना। इसका मतलब है कि कोई भी बाहरी दर्द, अपनी आत्मा पर लगे दाग़ से ज़्यादा दर्दनाक नहीं होता। यह सिर्फ़ दर्द नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी का एहसास है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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