हम तो इक हर्फ़ के नहीं मम्नून — मीर तक़ी मीर

हम तो इक हर्फ़ के नहीं मम्नून कैसा ख़त्त-ओ-पयाम होता है

“We are not content with just one letter's grace, What kind of epistle is this space?”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

हम तो बस एक अक्षर के नहीं मुतमईन हैं, ऐसा ख़त-ओ-पयाम कैसा है।

विस्तार

यह शेर दरअसल भावनाओं की गहराई को बयां करता है। शायर कह रहे हैं कि मुहब्बत या कोई भी एहसास इतना गहरा होता है कि वह सिर्फ़ एक शब्द में कैद नहीं हो सकता। कोई भी ख़त, कोई भी संदेश, सिर्फ़ एक अक्षर से मिलकर नहीं बनता.... उसे तो पूरे दिल का दर्द, पूरे जीवन का अनुभव चाहिए होता है। क्या आप सहमत हैं?

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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