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मजनूँ दश्त में है फ़रहाद कोह में था जिन से लुत्फ़-ए-ज़िंदगी वे यार मर गए

Neither is Majnu in the wilderness, nor Farhad in the mountain, Whose companions, the beloved friends, lost the pleasure of life.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मजनूँ न दश्त में है और न फ़रहाद कोह में, वे यार जो जीवन का आनंद देते थे, वे मर गए।

विस्तार

यह शेर एक बहुत गहरे, लगभग अस्तित्ववादी ग़म को बयां करता है। शायर कह रहे हैं कि उनका जो दर्द है, वो इतना बड़ा है कि वो मजनूँ और फ़राहाद जैसी महान प्रेम कहानियों से भी कहीं ज़्यादा है। उनका कहना है कि ज़िंदगी का मज़ा तो उन यारों से था, जो अब गुज़र गए हैं। यह बिछड़ने का ग़म, किसी भी लोक कथा के ग़म से बढ़कर है।

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