तू सुब्ह क़दम-रंजा करे टुक तो है वर्ना किस वास्ते आशिक़ की शब-ए-ग़म बसर आवे

“If your glance does not wound me in the morning, then what is it that allows the lover to spend the night in sorrow?”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

यदि तुम्हारी निगाह सुबह में मेरे क़दमों को पीड़ा नहीं देती, तो आशिक़ को दुःख की रात कैसे गुजारनी?

विस्तार

यह शेर इश्क़ के गहरे और दर्द भरे विरोधाभास को बयान करता है। शायर पूछ रहे हैं कि अगर सुबह में भी महबूब के क़दमों की आहट न हो, या वो हमें सता न करें, तो फिर उस आशिक़ को रात भर ग़म में गुज़ारने का क्या मतलब है? यह एक तरह से कह रहा है कि दर्द भी ज़रूरी है, क्योंकि उसी दर्द की वजह से ज़िंदा रहने का एक कारण मिलता है।

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