अब मुझ ज़ईफ़-ओ-ज़ार को मत कुछ कहा करो — मीर तक़ी मीर

अब मुझ ज़ईफ़-ओ-ज़ार को मत कुछ कहा करो जाती नहीं है मुझ से किसू की उठाई बात

“Do not speak anything to this weak and sorrowful self, For nothing that is raised up from me can depart.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

अब मुझ ज़ईफ़-ओ-ज़ार को मत कुछ कहा करो, क्योंकि मुझ से जो कुछ भी कहा जाता है, वह कभी जाती नहीं है।

विस्तार

यह शेर इंसान के दिल की नाज़ुकियत को बयां करता है। शायर कह रहे हैं कि मुझ जैसे कमज़ोर और परेशान मन से कोई बात न करे, क्योंकि मेरी याददाश्त इतनी तेज़ है कि कोई भी बात, कोई भी ज़ख़्म, मुझे कभी भुलाने नहीं देगा। यह एक तरह की इल्तिजा है... कि मेरी कमज़ोरियों को समझे, और मुझे तन्हा रहने दे।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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