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सर रखूँ उस के पाँव पर लेकिन
दस्त-ए-क़ुदरत ये मैं कहाँ पाई

Though I would place my head at her feet, By God's grace, where would I find such hands?

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मैं उसके चरणों में अपना सिर रखना चाहता हूँ, लेकिन प्रकृति की कृपा से मुझे ऐसे हाथ कहाँ मिल सकते हैं।

विस्तार

यह शेर सिर्फ मोहब्बत की बात नहीं करता, बल्कि किस्मत के सामने इंसान की बेबसी को बयां करता है। शायर कहते हैं कि मैं तो महबूब के सामने सर झुका सकता हूँ, अपनी मर्ज़ी से। लेकिन असली बात तो यह है कि इस ज़िंदगी में जो हाथ मुझे मिला है... जो क़ुदरत ने मुझे दी है... वो तो मेरे बस में नहीं। ये एक गहरा एहसास है कि हम अपनी इच्छाओं से ज़्यादा, तक़दीर के आगे झुकते हैं।

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