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हैं मुस्तहील ख़ाक से अज्ज़ा-ए-नव-ख़ताँ
क्या सहल है ज़मीं से निकलना नबात का

How impossible is it to achieve a new state from dust, How difficult is it for a plant to emerge from the earth?

मीर तक़ी मीर
अर्थ

शायर कहता है कि मुस्तहील (असंभव) है कि धूल से एक नई अवस्था प्राप्त की जाए, और ज़मीन से एक पौधे का निकलना कितना कठिन है।

विस्तार

यह शेर जीवन के संघर्ष और शुरुआत की मुश्किल को बयां करता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर पूछते हैं कि ज़मीन से नबात का निकलना कितना आसान है? इसका मतलब है कि धूल से कोई नया, ताज़ा फूल या कली निकलना लगभग असंभव है। यह पंक्तियाँ हमें बताती हैं कि किसी चीज़ को फिर से शुरू करना, या किसी गहरे दुख से उबरना, कितना कठिन काम होता है।

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