हम मुज़न्निबों में सिर्फ़ करम से है गुफ़्तुगू
मज़कूर ज़िक्र याँ नहीं सौम-ओ-सलात का
“Among those who compose verses, only I speak with grace, Not by mentioning the name, or of fasts and prayers' trace.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
हम शायरों में सिर्फ़ करम से बात करते हैं, न कि किसी का ज़िक्र या रोज़े-स नमाज़ का।
विस्तार
देखिए, यह शेर बहुत गहरे तर्ज़ पर लिखा गया है। शायर बता रहे हैं कि किसी भी रिश्ते में, या किसी भी बात की समझ में, सिर्फ़ 'करम' मायने रखता है। मतलब, किसी को अपनी बात मनवाने के लिए न तो उपवास का ज़िक्र करना ज़रूरी है, न ही पूजा-पाठ का। असली बात तो बस मेहरबानी और रहम की होती है। यह एहसास बहुत ख़ूबसूरत है!
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