क्या 'मीर' तुझ को नामा-स्याही का फ़िक्र है — मीर तक़ी मीर
क्या 'मीर' तुझ को नामा-स्याही का फ़िक्र है
ख़त्म-ए-रुसुल सा शख़्स है ज़ामिन नजात का
“O Meer, do you worry about the ink of your name? / For this man is a figure of salvation, like the end of prophets.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
क्या 'मीर' को अपने नाम की स्याही की चिंता है? यह शख़्स तो नजात का ज़मीं (आधार) है, जो नबी-रिसालत के अंत जैसा है।
विस्तार
यह शेर एक गहरा सवाल उठाता है। शायर पूछते हैं कि क्या आप सिर्फ़ कलम की स्याही और लिखने के फ़िक्र में उलझे हुए हैं? फिर वह तुरंत उस शख़्स की हैसियत बताते हैं—वो तो नजात का ज़मीन हैं, रूहानी वजूद। यह एक चुनौती है, कि इतने बड़े और महान इंसान को छोटी चीज़ों की फ़िक्र क्यों?
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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