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सूरत-पज़ीर हम बिन हरगिज़ नहीं वे माने अहल-ए-नज़र हमीं को मा'बूद जानते हैं

The people of Surat, without us, never will accept, / The people of vision know us as the divine.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

सूरत के लोग, बिना हमारे कभी नहीं मानेंगे। नज़रों के लोग हमें पूज्य (माबूद) जानते हैं।

विस्तार

यह शेर हुस्न की उस ताकत को बयान करता है, जो इंसान को इबादत का दर्जा दे देती है। शायर कहते हैं कि महबूब की सूरत इतनी कमाल की है कि लोग उसे सिर्फ़ देखना नहीं जानते.... बल्कि उसे माबूद (भगवान) मान लेते हैं। यह इबादत सिर्फ़ नज़र से नहीं, बल्कि दिल से होती है, और यह एहसास ही शायरी का सबसे गहरा पहलू है।

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