आ अंदलीब सुल्ह करें जंग हो चुकी — मीर तक़ी मीर

आ अंदलीब सुल्ह करें जंग हो चुकी ले ऐ ज़बाँ-दराज़ तू सब कुछ सिवाए गुल

“Oh, reconcile with the beloved, for the war has begun; O tongue, retract yourself, and speak of nothing but the flower.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

हे अंदलीब, प्रिय से सुलह करो, क्योंकि युद्ध हो चुका है; ऐ ज़बाँ-दराज़, तू सब कुछ सिवाए गुल (फूल) के न बोल।

विस्तार

यह शेर, मिर्ज़ा तक़ी मीर जी की शायरी का एक बेहतरीन नमूना है, जो हमें शांति और संयम का संदेश देता है। शायर यहाँ अपने अंदर के उग्र मन को समझा रहे हैं कि 'जंग' तो हो चुकी है, अब सुलह की ज़रूरत है। और अपनी ज़बान से कहते हैं कि तू हर बात कह दे... बस गुल (फूल) के सिवाए! यह एक गहरा इशारा है कि चाहे कितनी भी बहस हो, हमारा ज़िक्र हमेशा किसी न किसी खूबसूरत और नाज़ुक चीज़ के साथ होना चाहिए।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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