वो गराँ ख़्वाब जो है नाज़ का अपने सो है दाद बे-दाद रहो शब को कि फ़रियाद रहो

“Oh, the heavy dreams that are in the pride of your sleep, / Whether with praise or without, remain a lament in the night.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

वो भारी ख़्वाब जो अपने नज़ का घमंड हैं, रात में चाहे तारीफ़ हो या न हो, शिकायत बने रहना चाहिए।

विस्तार

यह शेर इंसान के दिल की एक बहुत ही गहरी उलझन को बयां करता है। शायर कहते हैं कि ज़िंदगी में कुछ ख़्वाब ऐसे होते हैं... जो बहुत भारी होते हैं, जो हमारे नज़ का हिस्सा होते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि हमें रात से बे-दाद रहना चाहिए, फिर भी फ़रियाद करते रहना चाहिए! यह किस तरह का विरोधाभास है? यह उस दर्द को दिखाता है... जो हमें कभी भुलाने नहीं देता!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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