ग़ज़ल
अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब
अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब
यह ग़ज़ल बताती है कि गहरे दुःख और निराशा से पूरी रात मुक्ति नहीं मिली। कवि ने अपनी कहानी शुरू की और अपनी आँखें खोल दीं, जिसके कारण उसे पूरी रात नींद नहीं आई। वह अपनी आँखों से सितारों की सुबह तक लगातार देखती रही, और अपने दुश्मनों से लड़ाई भी पूरी रात लड़ी।
गीत सुनें
1
अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब
मुझ दिल-ज़दा को नींद न आई तमाम शब
अंदोह से पूरी रात मुक्ति नहीं मिली, इसलिए दिल-ज़दा को पूरी रात नींद नहीं आई।
2
जब मैं शुरू क़िस्सा किया आँखें खोल दीं
यानी थी मुझ को चश्म-नुमाई तमाम शब
जब मैंने कहानी शुरू की और आँखें खोल दीं, तो इसका मतलब यह था कि मुझे पूरी रात तक घूरकर देखा गया था।
3
चश्मक चली गई थी सितारों की सुब्ह तक
की आसमाँ ने दीदा-दराई तमाम शब
तारों की सुबह का समय बीत गया, केवल उम्मीद बाकी रह गई, और आसमान ने पूरी रात देखी।
4
बख़्त-ए-सियह ने देर में कल यावरी सी की
थी दुश्मनों से उस को लड़ाई तमाम शब
बख़्त-ए-सियह ने देर रात में कल यारी की थी; दुश्मनों से उससे पूरी रात लड़ाई हुई।
5
बैठे ही गुज़री वादे की शब वो न आ फिरा
ईज़ा अजब तरह की उठाई तमाम शब
बैठे ही गुज़र गई वादे की रात, वह न आया फिरा। आज़ाब अजब तरह की उठाई तमाम रात।
6
सन्नाहटें से दिल से गुज़र जाएँ सो कहाँ
बुलबुल ने गो की नाला-सराई तमाम शब
वह कहाँ जा सकता है जो खामोशी से दिल से गुज़र जाए? बुलबुल ने पूरी रात 'गो' के सभी नाले और सरोवारे गाए।
7
तारे से मेरी पलकों पे क़तरे सरिश्क के
देते रहे हैं 'मीर' दिखाई तमाम शब
तारे से मेरी पलकों पर ओस की बूँदें गिरीं, 'मीर' ने पूरी रात दिखाईं।
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