मानिंद-ए-सुब्हा उक़दे न दिल के कभू खुले — मीर तक़ी मीर
“O lord of the morning's beauty, the knots of the heart never open, / Why are you yourself so excessive, that you abandon your daily prayers?”
अर्थ
सुबह की सुंदरता के स्वामी, दिल के गांठ कभी नहीं खुलते, / जी अपना क्यों कि छोड़ते न रोज़े नमाज़ से।
विस्तार
यह शेर दिल के गहरे और स्थायी दर्द को बयां करता है। शायर कहते हैं कि दिल के जो उलझनें हैं, वो कभी भी सुबह की रोशनी की तरह खुल नहीं सकतीं। वह पूछते हैं कि मेरी ज़िंदगी क्यों उस रोज़े या नमाज़ की तरह हो, जो बस एक दिन के लिए होते हैं और फिर खत्म हो जाते हैं। यह एक ऐसे दर्द का इज़हार है जो लगातार है, जो किसी अस्थायी राहत में सिमट नहीं सकता।
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