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हिज्राँ में उस के ज़िंदगी करना भला न था
कोताही जो न होवे ये उम्र-ए-दराज़ से

It was not good for me to live a life in separation from her, Lest I should slip away from this long life's span.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

बिछड़कर उसके जीवन जीना अच्छा नहीं था, कहीं कि इस लंबे जीवनकाल में कोताही न हो जाए।

विस्तार

मिर्ज़ा तक़ी मीर साहब इस शेर में जुदाई के दर्द का एक गहरा विरोधाभास बयां करते हैं। वो कहते हैं कि महबूब से दूर जीवन गुज़ारना भला नहीं है... लेकिन एक शर्त है! यह तड़प शायद तभी सह जा सकती है, जब हम अपनी पूरी ज़िंदगी में लापरवाही या कोताही न करें। यह ज़िन्दगी की लंबी राह पर सब्र और सचेत रहने की बात है।

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