ग़ज़ल
वज्द हो बुलबुल-ए-तस्वीर को जिस की बू से
وجد ہو بلبل تصویر کو جس کی بو سے
यह ग़ज़ल महबूब के अलौकिक सौंदर्य और इश्क़ की बेपनाह तड़प को दर्शाती है। शायर का मानना है कि महबूब का हुस्न बेजान तस्वीर में भी जान फूँक सकता है, और प्रेमी के दिल की भयानक आग के आगे शम्अ के चंद आँसू बेहद मामूली हैं।
Source: rekhta · HI
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1
वज्द हो बुलबुल-ए-तस्वीर को जिस की बू से
उस से गुल-रंग का दा'वा करे फिर किस रू से
2
शम्अ' के रोने पे बस साफ़ हँसी आती है
आतिश-ए-दिल कहीं कम होती है चार आँसू से
3
एक दिन वो था कि तकिया था किसी का बाज़ू
अब सर उठता ही नहीं अपने सर-ए-ज़ानू से
4
नज़्अ' में हूँ मिरी मुश्किल करो आसाँ यारों
खोलो तावीज़-ए-शिफ़ा जल्द मिरे बाज़ू से
5
शोख़ी-ए-चश्म का तू किस की है दीवाना 'अनीस'
आँखें मलता है जो यूँ नक़्श-ए-कफ़-ए-आहू से
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