“Since evening fell, my face has turned pale as the break of dawn; in separation's sorrow, I decline like the waning afternoon.”
आज शाम से ही मेरा चेहरा सुबह की रोशनी की तरह पीला पड़ा हुआ है, और जुदाई के दर्द में मैं ढलती हुई दोपहर की तरह बीतता जा रहा हूँ।
यहाँ शायर ने दिल के दर्द को वक्त के पहरों—शाम, सहर और दोपहर—के खूबसूरत तसव्वुर से समझाया है। शाम का वक़्त आ पहुँचा है, मगर जुदाई के सदमे से उनका चेहरा बिल्कुल बेरंग और पीला पड़ चुका है, ठीक भोर की उस धुंधली रोशनी की तरह। महबूब से बिछड़कर वह खुद को अंदर से धीरे-धीरे ढलता हुआ महसूस कर रहे हैं, जैसे दोपहर की तेज़ तपिश आहिस्ता-आहिस्ता ढलकर शाम की उदासी में खो जाती है।
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