ग़ज़ल

मेरो दरद न जाणै कोय

میرا درد نہ جانے کوئی
मीराबाई· Ghazal· 7 shers

यह ग़ज़ल एक प्रेमी या भक्त के गहरे दर्द को व्यक्त करती है, जहाँ यह बताया गया है कि केवल समान पीड़ा से गुजरे लोग ही उसकी गहराई को समझ सकते हैं। वक्ता, दिव्य प्रेम में लीन होकर, एक अद्वितीय पीड़ा महसूस करता है, जिससे शांति या विश्राम असंभव हो जाता है। यह गहन आध्यात्मिक या भावनात्मक वेदना की अनूठी और एकांत प्रकृति को उजागर करता है।

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लिपि व अर्थ
1
हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय।
हे सखी, मैं तो प्रेम में पूरी तरह दीवानी हो गई हूँ; मेरे इस दर्द को कोई भी नहीं समझता है।
2
घायल की गति घायल जाणै, जो कोई घायल होय।
एक घायल व्यक्ति की पीड़ा को केवल वही समझ सकता है जो स्वयं घायल हुआ हो। केवल वही व्यक्ति किसी घायल की दशा को भली-भांति जान सकता है जिसने खुद ऐसी चोट झेली हो।
3
जौहरि की गति जौहरी जाणै, की जिन जौहर होय।
एक रत्न के असली स्वभाव को केवल रत्न पारखी ही जान सकता है, या वह व्यक्ति जिसमें स्वयं वह जौहर (गुण) हो।
4
सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस बिध होय।
हमारी सेज सूली के ऊपर बिछी हुई है। ऐसे में हमें नींद कैसे आ सकती है?
5
गगन मंडल पर सेज पिया की किस बिध मिलणा होय।
मेरे प्रियतम का पलंग आकाश में है; मैं उनसे कैसे मिल पाऊँगी?
6
दरद की मारी बन-बन डोलूँ बैद मिल्या नहिं कोय।
दर्द से पीड़ित होकर मैं जंगल-जंगल भटकती हूँ, पर मुझे कोई वैद्य नहीं मिलता।
7
मीरा की प्रभु पीर मिटेगी, जद बैद सांवरिया होय।
मीरा का दर्द, हे प्रभु, तभी मिटेगा जब साँवरिया (श्री कृष्ण) स्वयं वैद्य बन जाएँगे।
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