“Held in the wind's grasp like a wisp of straw am I; neither bound to home, nor yearning for the road.”
मैं हवा के वश में घास के एक तिनके की तरह हूँ; मैं न तो घर का पाबंद हूँ और न ही मुझे सफ़र का कोई शौक़ है।
इस शेर में शायर खुद की तुलना हवा में उड़ते हुए एक हल्के-फुल्के सूखे तिनके (पर-ए-काह) से करता है, जिसकी अपनी कोई दिशा या ज़ोर नहीं होता। यह दिल की ऐसी बेपरवाह और हैरान-परेशान कैफियत है जहाँ न तो घर की चारदीवारी में रुकने का मन है, और न ही किसी नए सफर पर निकलने की कोई तमन्ना बची है। यह मुकद्दर के सामने एक खामोश सुपुर्दगी है, जहाँ इंसान अपने सारे फैसले हवा और वक्त के हाथों में छोड़ देता है।
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