“In this world's garden I am like the ground-champa tree: craving no sweet fruit, my friend, nor fearing wrath's decree.”
मैं इस दुनिया के बाग़ में भूचम्पा के पौधे की तरह हूँ; हे दोस्त, मुझे न तो फल पाने की कोई ख़्वाहिश है और न ही किसी क़हर का कोई डर।
इस ख़ूबसूरत शेर में शायर दुनिया को एक बाग़ मानकर ख़ुद की तुलना 'भूचंपा' के छोटे से पौधे से करता है, जो ज़मीन के क़रीब महकता है मगर कोई फल नहीं देता। जब दिल में फल पाने यानी किसी मुनाफ़े की चाह ही नहीं बची, तो फिर दुनिया की नाराज़गी या नुक़सान का कोई डर भी नहीं रहता। यह शेर हमें सिखाता है कि बे-ग़रज़ ज़िंदगी जीने का सबसे हसीन रास्ता ख्वाहिशों के बोझ से आज़ाद हो जाना है।
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