“I marvel at the comprehension of the literalists so blind: where is this 'other'? Just where did they another ever find?”
मैं ज़ाहिरपरस्त और सतही लोगों की समझ पर हैरान हूँ कि दूसरा कहाँ है और उन्होंने उसे किधर देखा है।
इस शेर में शायर उन संकीर्ण सोच वाले लोगों (क़िश्रियों) पर एक मीठी सी चुटकी लेते हैं, जो सिर्फ़ बाहरी छिलके को सच मान बैठते हैं और रूहानी गहराई को नहीं समझ पाते। सूफ़ी नज़रिए से देखें तो हर ज़र्रे में उसी एक माशूक़ का नूर है, जहाँ द्वैत या 'दूसरे' की कोई गुंजाइश ही नहीं। शायर बड़ी मासूमियत से हैरान होकर पूछते हैं कि जब पूरी कायनात में सिर्फ़ वही एक मौजूद है, तो आख़िर इन ज़ाहिर-परस्तों को यह 'दूसरा' कहाँ नज़र आ गया?
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