गँवा रहा है अजब शैख़ उम्र ख़ल्वत में शरीक-ए-हल्क़ा-ए-पीर-ए-मुग़ाँ नहीं होता

“How strangely the Sheikh squanders his life away in solitude / Never joining the circle of the Master of the tavern.”

— ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
अर्थ

शैख़ बहुत अजीब है कि अपनी ज़िंदगी तन्हाई में ज़ाया कर रहा है और मयख़ाने के मुर्शिद (पीर-ए-मुग़ाँ) की महफ़िल में शरीक नहीं होता।

विस्तार

इस शे’र में शायर बड़े प्यार से ज़ाहिद या शैख़ की सूखी तपस्या पर तंज़ कर रहा है, जो दुनिया से कटकर तन्हाई में अपनी अनमोल उम्र गँवा रहा है। ग़ज़ल की रिवायत में 'पीर-ए-मुग़ाँ' (मयख़ाने का मुर्शिद) उस सच्चे रहबर का प्रतीक है जो महफ़िल, मुहब्बत और रूहानी मस्ती का रास्ता दिखाता है। शायर का कहना है कि बंद कमरों की बेजान इबादत से कहीं बेहतर है कि इंसान इश्क़ के उस हल्के में शामिल हो, जहाँ ज़िंदगी वाक़ई महसूस होती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.