“How strangely the Sheikh squanders his life away in solitude / Never joining the circle of the Master of the tavern.”
शैख़ बहुत अजीब है कि अपनी ज़िंदगी तन्हाई में ज़ाया कर रहा है और मयख़ाने के मुर्शिद (पीर-ए-मुग़ाँ) की महफ़िल में शरीक नहीं होता।
इस शे’र में शायर बड़े प्यार से ज़ाहिद या शैख़ की सूखी तपस्या पर तंज़ कर रहा है, जो दुनिया से कटकर तन्हाई में अपनी अनमोल उम्र गँवा रहा है। ग़ज़ल की रिवायत में 'पीर-ए-मुग़ाँ' (मयख़ाने का मुर्शिद) उस सच्चे रहबर का प्रतीक है जो महफ़िल, मुहब्बत और रूहानी मस्ती का रास्ता दिखाता है। शायर का कहना है कि बंद कमरों की बेजान इबादत से कहीं बेहतर है कि इंसान इश्क़ के उस हल्के में शामिल हो, जहाँ ज़िंदगी वाक़ई महसूस होती है।
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