कभी वो हो के ख़फ़ा मेहरबान नहीं होता तिरे बनाए कुछ अब ऐ फ़ुग़ाँ नहीं होता

“Once turned away in anger, they never show grace again; nothing is mended now by your pleading, O lament of mine!”

— ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
अर्थ

जब वह एक बार नाराज़ हो जाता है तो फिर कभी मेहरबान नहीं होता, इसलिए ऐ मेरी फ़रियाद! अब तेरे कुछ करने से भी कोई बात नहीं बनती।

विस्तार

इस शे'र में शायर अपने दिल के टूटने और बेवसी की इंतिहा को बयां कर रहा है। वह अपनी ही फ़रियाद और आंसुओं (फ़ुग़ाँ) से मुख़ातिब होकर कहता है कि अब तुम्हारे तड़पने से कुछ नहीं सुधरेगा, क्योंकि महबूब अगर एक बार रूठ जाए तो फिर कभी मेहरबान नहीं होता। यह उस दर्दनाक मोड़ की तस्वीर है जहाँ सारी मिन्नतें और रोना-धोना पत्थर के सामने बेअसर साबित होता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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