भरो फ़ुज़ूल न दम आशिक़ी का तुम ऐ दिल जो ज़ब्त-ए-आह भी तुम से अयाँ नहीं होता

“O heart, boast not in vain of walking passion's way, when you cannot even keep a single sigh at bay.”

— ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
अर्थ

ऐ दिल, आशिक़ी का झूठा दम मत भरो, जब तुमसे अपनी आह को रोकना या ज़ब्त करना भी मुमकिन नहीं होता।

विस्तार

उर्दू शायरी की रवायत में सच्चे आशिक़ की पहचान उसका सब्र और ख़ामोशी होती है, जहाँ दर्द को होंठों तक न आने देना ही इश्क़ का सबसे बड़ा अदब है। इस शेर में शायर अपने ही दिल को समझाते हुए एक मीठा सा तंज़ करता है कि इश्क़ के बड़े-बड़े दावे करना छोड़ दो। जब तुम से दर्द में एक आह तक नहीं दबाई जाती और सारा राज़ खुल जाता है, तो फिर इस सख़्त रास्ते पर चलने का झूठा गुरूर कैसा!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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