“Those upon whose mastery wisdom itself took rightful pride, were turned to mere schoolroom novices by an unlettered guide.”
जिनकी उस्तादी और विद्वता पर स्वयं ज्ञान व दर्शन को गर्व था, एक उम्मी (अनपढ़ कहे जाने वाले पैगंबर) ने उन्हें पाठशाला के छोटे बच्चों जैसा बना दिया।
इस शेर में दुनियावी अक़्ल और रूहानी हिकमत के बीच का फ़र्क़ बड़ी ख़ूबसूरती से उभारा गया है। शायर कहता है कि जिन बड़े-बड़े दार्शनिकों और आलिमों की महारत पर ख़ुद ज्ञान को नाज़ था, वे एक 'उम्मी' (जिन्होंने कोई दुनियावी तालीम नहीं ली, यानी हज़रत मुहम्मद) के सामने ऐसे हो गए जैसे पाठशाला के छोटे बच्चे हों। यह तशबीह सिखाती है कि इंसानी फ़लसफ़ा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, जब ख़ुदा की अता की हुई सच्ची रोशनी सामने आती है, तो सब उसके आगे झुक जाते हैं।
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