“To what heights, O boundless longing, have you raised my love divine: first my life, then the soul of my life, and now the beloved of all souls.”
हे अत्यधिक प्रेम, तूने उस महबूब को क्या से क्या बना दिया; पहले उन्हें मेरी जान बनाया, फिर जान की भी जान और अंत में सभी जानों का महबूब बना दिया।
इस शे’र में शायर अपने बेपनाह इश्क़ और ललक (शौक़-ए-फ़रावाँ) की ताक़त को देखकर हैरान है। मुहब्बत ने महबूब के मर्तबे को धीरे-धीरे कितना ऊँचा उठा दिया—पहले वह सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी ('जाँ') थे, फिर ज़िंदगी की रूह ('जान-ए-जाँ') बने, और आख़िरकार पूरी कायनात के महबूब ('जान-ए-जानाँ') बन गए। यह शे’र बतलाता है कि जब चाहत अपनी हदें पार करती है, तो महबूब सिर्फ़ एक इंसान न रहकर पूरी दुनिया की जान बन जाता है।
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